शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कागज खरीद मामले में एनसीईआरटी अधिकारियों पर कार्रवाई का आदेश दिया
Press Trust of India | July 11, 2026 | 07:32 AM IST | 2 mins read
एनसीईआरटी का प्रतिनिधि कोर्ट की सुनवाई में शामिल नहीं हुआ, हालांकि, अदालत ने कंपनी को अगले आदेश तक दंडात्मक कार्रवाई से छूट दे दी।
नई दिल्ली: शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने एनसीईआरटी के उन अधिकारियों की भूमिका की जांच के आदेश दिए हैं, जो पाठ्यपुस्तकों के लिए कागज की आपूर्ति करने वाली एक कंपनी को काली सूची में डालने की कार्रवाई के फैसले का उच्च न्यायालय में बचाव करने में नाकाम रहे। सूत्रों ने यह जानकारी दी। 'बाफना ग्लोबल वेंचर प्राइवेट लिमिटेड' ने राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा 22 जून को जारी काली सूची आदेश का हवाला देते हुए 24 जून को दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया, जिसमें उसे एनसीईआरटी की खरीद प्रक्रिया में भाग लेने से दो साल के लिए रोक दिया गया था।
एनसीईआरटी का प्रतिनिधि कोर्ट की सुनवाई में शामिल नहीं हुआ, हालांकि, अदालत ने कंपनी को अगले आदेश तक दंडात्मक कार्रवाई से छूट दे दी। कोर्ट ने एनसीईआरटी को कागज आपूर्तिकर्ता की 6 करोड़ रुपये से ज्यादा की बैंक गारंटी भुनाने से भी रोक दिया।
धर्मेंद्र प्रधान ने दिए सख्त कार्रवाई के निर्देश
एक सूत्र ने बताया, ''एनसीईआरटी द्वारा कागज आपूर्तिकर्ता को काली सूची में डालने के अपने फैसले का दिल्ली उच्च न्यायालय में असरदार ढंग से बचाव न कर पाने की खबरों पर गंभीरता से संज्ञान लेते हुए, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस चूक के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।''
सूत्र ने कहा, ''मंत्री ने उन अधिकारियों की जवाबदेही तय करने का आदेश दिया है जो जरूरी कानूनी कदम उठाने में नाकाम रहे। इससे प्रशासनिक और कानूनी चूक को कतई बर्दाश्त नहीं करने का रवैया मजबूत होगा और साथ ही पाठ्यपुस्तकों के उत्पादन और खरीद में ज्यादा जवाबदेही सुनिश्चित होगी।''
सूत्र ने कहा, ''मंत्रालय ने एनसीईआरटी से यह जांचने को कहा है कि जरूरी शर्तें पूरी न करने के आरोपों के बावजूद बाफना ग्लोबल वेंचर प्राइवेट लिमिटेड को कैसे चुना गया, बाद में वह कागज की आपूर्ति करने की समयसीमा का पालन करने में क्यों नाकाम रही और अदालत में एनसीईआरटी का पक्ष क्यों नहीं रखा गया।''
कंपनी ने अदालत में दलील दी कि किताबें छापने में देरी इसलिए हुई क्योंकि ईरान युद्ध के कारण आवश्यक कच्चा माल उपलब्ध नहीं था।
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