Delhi High Court: फीस नियमन समिति के खिलाफ अल्पसंख्यक स्कूलों की याचिका पर शिक्षा निदेशालय को कोर्ट का नोटिस
Press Trust of India | January 9, 2026 | 06:14 PM IST | 2 mins read
अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा प्राप्त विद्यालयों की ओर से दाखिल इन याचिकाओं में फीस नियमन और इस संबंध में जारी नियमावली को चुनौती दी गई।
नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने कई अल्पसंख्यक विद्यालयों द्वारा स्कूलों में शुल्क वृद्धि के लिए सरकारी मंजूरी अनिवार्य करने संबंधी कानून की संवैधानिकता को चुनौती देने के लिए दाखिल याचिकाओं पर शुक्रवार को सुनवाई करते हुए शिक्षा निदेशालय और उपराज्यपाल से जवाब तलब किया। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने शिक्षा निदेशालय और उपराज्यपाल को नोटिस जारी कर 6 सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा।
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 12 मार्च को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा प्राप्त विद्यालयों की ओर से दाखिल इन याचिकाओं में फीस नियमन और इस संबंध में जारी नियमावली को चुनौती दी गई।
समितियों के गठन के लिए समय सीमा बढ़ी
कोर्ट ने शुल्क निर्धारण समितियों के गठन के लिए दी गई समय सीमा बढ़ाकर 20 जनवरी कर दी। उसने यह भी कहा कि स्कूल प्रबंधन द्वारा समितियों को शुल्क का मसौदा जमा कराने की तिथि 25 जनवरी से बढ़ाकर 5 फरवरी करनी चाहिए।
नए अधिनियम के तहत यह अनिवार्य है कि निजी विद्यालय में सभी शुल्क वृद्धि को माता-पिता, स्कूल प्रबंधन और सरकारी प्रतिनिधियों को शामिल करने वाली एक पारदर्शी, त्रिस्तरीय समिति प्रणाली के माध्यम से अनुमोदित किया जाना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता ने कहा कि प्रशासन का अधिकार प्राप्त समितियों की संरचना सरकार द्वारा निर्धारित नहीं की जा सकती। ऐसी समितियों में बाहरी व्यक्तियों को शामिल करना संविधान के अनुच्छेद 30 का उल्लंघन है।
याचिका में कहा गया है, ‘‘याचिकाकर्ता विद्यालयों को संविधान के अनुच्छेद 30 (1) के तहत संबंधित शैक्षणिक संस्थान की स्थापना और प्रशासन करने का मौलिक अधिकार है और इसे किसी भी कानून द्वारा छीना नहीं जा सकता..."
अदालत ने बृहस्पतिवार को कई निजी विद्यालयों द्वारा दायर याचिकाओं पर इसी तरह का आदेश पारित किया था। शिक्षा निदेशालय का पक्ष रखने के लिए पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एस वी राजू ने दलील दी कि अधिनियम में कुछ भी गलत नहीं है।
उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 30 की व्याख्या करने वाले उच्चतम न्यायालय के कई निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि यह सरकार को नियामक उपाय करने की अनुमति देता है।
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