Uttarakhand Madarsa Board: उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड होगा खत्म, अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का किया गया गठन
Press Trust of India | February 3, 2026 | 10:40 PM IST | 2 mins read
पिछले साल अगस्त में गैरसैंण में विधानसभा के मानसून सत्र में उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक-2025 पारित किया गया था जिसे अक्टूबर में राज्यपाल की मंजूरी मिल गई थी।
नई दिल्ली: उत्तराखंड सरकार ने 3 फरवरी को राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन किया जो इस साल जुलाई में समाप्त होने वाले मदरसा बोर्ड की जगह लेगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के विशेष सचिव डॉ पराग मधुकर धकाते ने इस संबंध में अधिसूचना जारी की।
अधिसूचना के अनुसार, राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत) गुरमीत सिंह ने प्राधिकरण का गठन करते हुए उसमें अध्यक्ष समेत 12 सदस्यों को नियुक्त करने की स्वीकृति दी है। उन्होंने बताया कि इसमें सभी सदस्य अल्पसंख्यक समुदाय के हैं।
उन्होंने कहा कि इसमें डॉ सुरजीत सिंह गांधी को अध्यक्ष के रूप में जबकि प्रोफेसर राकेश जैन, डॉ सैय्यद अली हमीद, प्रोफेसर पेमा तेनजिन, डॉ एल्बा मेड्रिले, प्रोफेसर रोबिना अमन, प्रो गुरमीत सिंह, समाज सेवी राजेंद्र बिष्ट और सेवानिवृत अधिकारी चंद्रशेखर भट्ट को सदस्य के रूप में शामिल किया गया है।
प्राधिकरण में विद्यालयी शिक्षा महानिदेशक, राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद के निदेशक तथा अल्पसंख्यक कल्याण निदेशक भी बतौर पदेन सदस्य प्राधिकरण में शामिल किए गए हैं।
पिछले साल अगस्त में गैरसैंण में विधानसभा के मानसून सत्र में उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक-2025 पारित किया गया था जिसे अक्टूबर में राज्यपाल की मंजूरी मिल गई थी।
इसके तहत राज्य में जुलाई 2026 से मदरसा बोर्ड को समाप्त किया जाना है तथा राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन कर सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को उसके तहत लाने का प्रावधान है।
इस संबंध में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा, “हमारी सरकार ने मदरसा बोर्ड खत्म करने और राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के गठन का फैसला किया है। अब यह प्राधिकरण तय करेगा कि अल्पसंख्यक बच्चों को कैसी शिक्षा दी जाएगी।”
नए कानून में राज्य में मुसलमान समुदाय के साथ ही अन्य अल्पसंख्यक समुदायों-सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी समुदाय के शिक्षण संस्थानों को भी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान का दर्जा दिया गया है। इससे पहले अल्पसंख्यक संस्थानों की मान्यता केवल मुस्लिम समुदाय तक सीमित थी।
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