SC Extends TET Deadline: इन-सर्विस शिक्षकों के लिए TET पास करना अनिवार्य, कोर्ट ने 31 अगस्त 2028 तक बढ़ाया समय
Press Trust of India | May 30, 2026 | 06:03 PM IST | 2 mins read
सुप्रीम कोर्ट ने कार्यरत (In-Service) शिक्षकों के लिए भी शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) पास करना अनिवार्य बताते हुए इसकी समय-सीमा को 31 अगस्त 2028 तक बढ़ा दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सेवा में बने रहने के लिए तय अवधि में यह योग्यता हासिल करनी होगी और इसके बाद अब कोई अतिरिक्त समय नहीं दिया जाएगा
नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में यह साफ कर दिया है कि वर्तमान में कार्यरत (In-Service) शिक्षकों के लिए भी शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) पास करना पूरी तरह अनिवार्य है। अदालत ने सेवा में बने रहने के लिए इस परीक्षा को उत्तीर्ण करने की समय-सीमा को एक साल और बढ़ाते हुए 31 अगस्त 2028 तक कर दिया है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने विभिन्न राज्य सरकारों, शिक्षक संघों और व्यक्तिगत शिक्षकों द्वारा दायर 65 से अधिक पुनर्विचार याचिकाओं (Review Petitions) को खारिज करते हुए यह आदेश दिया।
याचिकाकर्ताओं ने 'अंजुमन इशात-ए-तालीम ट्रस्ट' मामले में कोर्ट के 2025 के उस पुराने फैसले पर पुनर्विचार की मांग की थी, जिसमें कहा गया था कि शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 के लागू होने से पहले नियुक्त हुए शिक्षकों को (जिनकी सेवानिवृत्ति में 5 वर्ष से अधिक का समय बाकी है) 1 सितंबर 2025 से दो साल के भीतर टीईटी पास करना होगा।
अब अपने नए आदेश में अदालत ने कहा है कि चूंकि संबंधित अधिकारियों द्वारा टीईटी परीक्षा का समय पर आयोजन जरूरी है और इसके लिए आवश्यक समय व संसाधन सीमित हैं, इसलिए हम इस समय-सीमा को 2 साल से बढ़ाकर 3 साल कर रहे हैं। अब शिक्षकों को यह योग्यता मूल रूप से निर्धारित 31 अगस्त 2027 के बजाय 31 अगस्त 2028 तक हासिल करनी होगी।
अब आगे नहीं मिलेगा कोई अतिरिक्त समय
शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि इस विस्तारित अवधि के बाद समय-सीमा में कोई और बढ़ोतरी नहीं की जाएगी। इसके साथ ही कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के उस तर्क को भी सिरे से खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि टीईटी की अनिवार्यता को पिछली तारीख से लागू किया जा रहा है। पीठ ने कहा कि आरटीई (RTE) अधिनियम का वैधानिक ढांचा स्पष्ट रूप से यह तय करता है कि सेवारत शिक्षकों को भी एक निर्धारित समय के भीतर न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता हासिल करनी होगी।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि आरटीई अधिनियम और एनसीटीई अधिनियम में 2011 के संशोधन से पहले नियुक्त किए गए शिक्षकों को उनके करियर के बीच में टीईटी पास करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। उन्होंने दलील दी थी कि यह सेवा शर्तों में किया गया एक अनुचित बदलाव है।
कानून की मूल भावना से ऊपर नहीं हो सकते नियम
फैसले के दौरान पीठ ने टिप्पणी की कि संसद (विधायिका) की मंशा साफ थी कि सेवा में पहले से मौजूद शिक्षक भी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए तय किए गए न्यूनतम मानकों और योग्यताओं को पूरा करें। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (NCTE) द्वारा जारी किसी भी अधिसूचना या अधीनस्थ नियमों के तहत दी गई कोई भी छूट, संसद द्वारा बनाए गए मूल कानून को ओवरराइड या अमान्य नहीं कर सकती है।
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