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NCERT Textbook Row: एनसीईआरटी 8वीं की पुस्तक से हटा सकती है न्यायपालिका से संबंधित विवादास्पद अंश - सूत्र

Press Trust of India | February 25, 2026 | 09:39 PM IST | 3 mins read

एक सरकारी अधिकारी ने कहा, ''यदि छात्रों को भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाया जाना है, तो आदर्श रूप से इस अध्याय में उन्हें भ्रष्टाचार की शिकायत दर्ज कराने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए था, न कि किसी संस्था को निशाना बनाया जाना चाहिए था।''

एनसीईआरटी ने पुस्तक को अपनी वेबसाइट से हटा दिया है। (प्रतीकात्मक-फ्रीपिक)
एनसीईआरटी ने पुस्तक को अपनी वेबसाइट से हटा दिया है। (प्रतीकात्मक-फ्रीपिक)

नई दिल्ली: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की आठवीं कक्षा की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित विवादास्पद अंश को हटाया जा सकता है। एनसीईआरटी ने पुस्तक को अपनी वेबसाइट से हटा दिया है।

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक सिंघवी द्वारा मामले का, तत्काल विचार करने के लिए उल्लेख किये जाने के बाद, प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और विपुल एम पंचोली की पीठ ने एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका के बारे में ''आपत्तिजनक'' सामग्री का स्वतः संज्ञान लिया है।

इससे अलग, प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने एनसीईआरटी की 8वीं कक्षा के पाठ्यक्रम में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर एक अध्याय को लेकर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा है कि धरती पर किसी को भी न्यायपालिका को बदनाम करने और उसकी सत्यनिष्ठा को धूमिल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

आठवीं कक्षा के लिए एनसीईआरटी की नई सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक में कहा गया है कि भ्रष्टाचार, काफी संख्या में लंबित मामले और काफी संख्या में न्यायाधीशों की कमी न्यायिक प्रणाली के समक्ष पेश आने वाली चुनौतियों में शामिल हैं।

इस बीच, यह जानकारी मिली है कि एनसीईआरटी ने अध्याय से संबंधित विषय विशेषज्ञों और इसे मंजूरी देने वाले अधिकारियों की अनुशंसा की समीक्षा के लिए एक आंतरिक बैठक बुलाई है। एनसीईआरटी के अध्यक्ष दिनेश प्रसाद सकलानी ने इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया के लिए किये गए फोन और भेजे गए संदेशों का जवाब नहीं दिया।

परिषद के एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने यह कहते हुए टिप्पणी करने से इनकार कर दिया कि मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है। सरकारी सूत्रों ने कहा कि हालांकि, एनसीईआरटी एक स्वायत्त संस्था है, लेकिन अध्याय जोड़ने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को सोच-समझकर निर्णय लेना चाहिए था।

उन्होंने कहा कि यदि भ्रष्टाचार के मुद्दे को पाठ्यपुस्तक में शामिल करना ही था, तो इसे कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका - तीनों से संबंधित होना चाहिए था।

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पुस्तक के अनुसार, उच्चतम न्यायालय में लगभग 81,000, उच्च न्यायालयों में 62.40 लाख और जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों में 4.70 करोड़ मामले लंबित हैं। यह न्यायपालिका के आंतरिक जवाबदेही तंत्र को रेखांकित करती है और केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण एवं निगरानी प्रणाली के माध्यम से शिकायतें प्राप्त करने की स्थापित प्रक्रिया का उल्लेख करती है।

पुस्तक के अनुसार, 2017 और 2021 के बीच इस प्रणाली के माध्यम से 1,600 से अधिक शिकायतें प्राप्त हुईं। पाठ्यपुस्तक में पूर्व प्रधान न्यायाधीश बी आर गवई का भी उल्लेख है, जिन्होंने जुलाई 2025 में कहा था कि न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार और कदाचार के मामलों का लोगों के विश्वास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

पुस्तक में उन्हें उद्धृत करते हुए कहा गया, ''हालांकि, इस भरोसे को फिर से कायम करने का रास्ता इन मुद्दों को सुलझाने के लिए त्वरित, निर्णायक और पारदर्शी कार्रवाई में निहित है... पारदर्शिता और जवाबदेही लोकतांत्रिक गुण हैं।''

सरकारी सूत्रों ने बताया कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित आंकड़े संसदीय अभिलेखों और राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड में उपलब्ध हैं, लेकिन तथ्यों की पुष्टि के लिए केंद्रीय कानून मंत्रालय से संपर्क नहीं किया गया। सूत्रों ने यह भी बताया कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को लेकर पूर्व प्रधान न्यायाधीश गवई के बयान को संदर्भ से बाहर लिया गया और माना जा रहा है कि वह इससे नाराज हैं।

एक सरकारी अधिकारी ने कहा, ''यदि छात्रों को भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाया जाना है, तो आदर्श रूप से इस अध्याय में उन्हें भ्रष्टाचार की शिकायत दर्ज कराने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए था, न कि किसी संस्था को निशाना बनाया जाना चाहिए था।''

उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत और 25 उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के विरुद्ध भ्रष्टाचार की शिकायतों से निपटने के लिए आंतरिक व्यवस्था पहले से ही मौजूद है। उन्होंने कहा कि संविधान निर्माताओं के अनुसार, न्यायपालिका एक स्वतंत्र संस्था है जो ऐसे मामलों से निपटने में सक्षम है।

इस महीने की शुरुआत में, कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लोकसभा को बताया था कि 2016 से 2025 के बीच मौजूदा न्यायाधीशों के खिलाफ 8,639 शिकायतें प्राप्त हुई हैं। इनमें से सबसे अधिक शिकायतें (1,170) वर्ष 2024 में प्रधान न्यायाधीश के कार्यालय को (तत्कालीन) मौजूदा न्यायाधीशों के खिलाफ प्राप्त हुईं।

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