दिल्ली का भलस्वा स्लम: आधार कार्ड और गंदगी से गुम हुई शिक्षा
Lalit kumar | October 16, 2025 | 04:32 PM IST | 3 mins read
भलस्वा स्लम के बच्चे स्कूल नहीं, कबाड़ बीनने जाते हैं। स्कूल न जाने की एक वजह आधार कार्ड न होना भी है।
नई दिल्ली: दिल्ली का भलस्वा स्लम — जहां शिक्षा पाना अब भी एक सपने जैसा है। यहां की करीब दो लाख आबादी भारत की संसद से सिर्फ 25 किलोमीटर और दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता के घर से महज 5 किलोमीटर की दूरी पर रहती है। फिर भी यहां के हालात ऐसे हैं कि बच्चों के हाथों में किताबें नहीं, बल्कि कूड़े के ढेर से तांबा, लोहे और प्लास्टिक चुनने की थैलियां हैं।
यूनेस्को 2009 और आशा इंडिया की 2013 की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली स्लम की साक्षरता दर करीब 56% है — लेकिन यह आंकड़ा ज़मीन की हकीकत को छिपा नहीं सकता। यहां सैकड़ों बच्चे स्कूल जाने की उम्र में लैंडफिल साइट पर कबाड़ बीनने को मजबूर हैं।
मां-बाप की रोज़ी रोटी, बच्चों की मजबूरी
भलस्वा स्लम से सटा भलस्वा लैंडफिल, हजारों लोगों की रोज़ी का ज़रिया है। यहां के अधिकतर लोग और उनके बच्चे कूड़े में से धातु, तार और प्लास्टिक चुनते हैं। भलस्वा झोपड़पट्टी में रहने वाला साजिद एमसीडी प्राइमरी स्कूल में पांचवीं कक्षा का विद्यार्थी है, उसका कहना है कि “मम्मी-पापा कबाड़ बीनने जाते हैं मगर मैं स्कूल जाता हूं।”
लेकिन साजिद को ABCD, 10 का पहाड़ा, यहां तक कि अपने नाम की स्पेलिंग भी नहीं आती। वहीं, दूसरी कक्षा में पढ़ने वाले कई अन्य बच्चों की स्थिति भी बेहतर नहीं कही जा सकती वे भी अक्षर पहचानने में असमर्थ हैं।
बच्चे भी जाते हैं कबाड़ बीनने
मूलतः गोरखपुर से संबंध रखने वाली चंचल चांदनी भलस्वा झोपड़पट्टी की होकर रह गई हैं, वह बताती हैं —“मेरी दो बेटियां नजफगढ़ में पढ़ती हैं, लेकिन लड़के कबाड़ बीनने जाते हैं। रात में मैं भी तांबा-पीतल निकालने जाती हूं। जब पेट खाली रहेगा तो पढ़ाई कौन करेगा और कैसे करेगा।” उनके मुताबिक, ज्यादातर बच्चे पढ़ने नहीं जाते, क्योंकि घर चलाने की ज़िम्मेदारी बचपन में ही उनके कंधों पर आ जाती है।
आधार कार्ड की अड़चन
शिक्षा के रास्ते में एक और बड़ी दीवार है — आधार कार्ड की कमी। बिहार से आई एक महिला बताती हैं — “आधार कार्ड नहीं होने से बच्चे का नाम स्कूल में नहीं लिखा गया।” अरीशा, जो ट्रेड यूनियन NGO से जुड़ी हैं, बताती हैं —
“भलस्वा में 40% बच्चे ही पढ़ने जाते हैं। बाकी बच्चे इसलिए वंचित रह जाते हैं क्योंकि उनके पास आवश्यक दस्तावेज नहीं हैं। ये लोग दिल्ली में रहते हैं, लेकिन आधार कार्ड अब भी गांव का है।”
यहां रहने वाले ज़्यादातर परिवार बिहार, यूपी और पश्चिम बंगाल से आए प्रवासी हैं, जिनके पास दिल्ली का कोई वैध दस्तावेज नहीं है।
खस्ता हालात, जहरीली ज़िंदगी
भलस्वा स्लम में रहना किसी सज़ा से कम नहीं। कहने को पानी रंगहीन, गंधहीन और स्वादहीन द्रव है पर भलस्वा बस्ती के रहने वालों का अनुभव कुछ और ही कहता है। चंचल चांदनी बताती हैं —“बोरिंग से लाल पीला और खारा पानी निकलता है जो कि पीने लायक नहीं। मजबूरी में पानी खरीदना पड़ता है।”
साजिद का घर महज़ 6x6 फुट का एक कमरा है, जिसमें पांच लोग रहते हैं। कुछ सदस्य घर मौजूद इकलौते कामचलाऊ बिस्तर पर और बाकी नीचे रात काटते हैं। प्लास्टिक की छत बरसात में टपकने लगती है, तो टपकते पानी को इकट्ठा करने के लिए बाल्टियों की मदद ली जाती है।
नशे की लत और छूटती स्कूल की राह - रचना, जो सेवा दिल्ली यूनियन से जुड़ी हैं, कहती हैं — “लड़कियां बहुत कम स्कूल जाती हैं। ज़्यादातर की शादी 16 साल की उम्र में हो जाती है। माता-पिता खुद बच्चों को कबाड़ बीनने ले जाते हैं क्योंकि इससे कमाई होती है।” उनका कहना है कि कई बच्चे खराब संगत में पड़कर नशे और शराब की लत में पड़ चुके हैं, इससे भी बच्चे बच जाते हैं।
सरकार का अधमरा सहयोग
भलस्वा में रहने वाले शेख फारूख के पांच बच्चे हैं। तीन बेटियों की शादी हो चुकी है, और दो बेटे MCD स्कूल में पढ़े हैं। इनका पोता तीसरे दर्जे में पढ़ रहा है। वो बताते हैं —“सरकार की तरफ से साल में 1500 रुपये मिलते हैं, बस कपड़े ले पाते हैं। हम खुद कबाड़ बीनते हैं, लेकिन चाहते हैं कि बच्चे पढ़ें। खुद के खर्चों में कटौती करके बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था करनी पड़ती है।”
दिल्ली की सीमा के भीतर ही एक ऐसा इलाका, जहां बच्चों के सपने कूड़े के नीचे दबे पड़े हैं। यहां साक्षरता का मतलब सिर्फ नाम लिखने की योग्यता तक सीमित है, और स्कूल जाना किसी लग्ज़री से कम नहीं। भलस्वा की गलियों में हर दिन बच्चे और कूड़ा — दोनों एक ही कहानी कहते हैं।
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