Santosh Kumar | August 14, 2026 | 06:45 PM IST | 4 mins read
'विकसित भारत @2047' के नारों के बीच, जमीनी हकीकत यह है कि देश की पूरी परीक्षा व्यवस्था विश्वसनीयता के संकट से जूझ रही है। चाहे स्कूली स्तर हो, उच्च शिक्षा हो या भर्ती परीक्षाएं- केंद्र और राज्यों, दोनों के ही दावे खोखले नजर आते हैं।

नई दिल्ली: भारत कल अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है। आजादी के 80 साल बाद भी, देश का शिक्षा सिस्टम बड़े-बड़े वादों और दावों में उलझा हुआ दिखता है, जो केवल कागजों तक ही सीमित रह गए हैं। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 में शिक्षा पर जीडीपी का 6 प्रतिशत खर्च करने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन असल खर्च अभी भी लगभग 4.1 प्रतिशत पर ही अटका हुआ है। हाल की संसदीय समिति की रिपोर्टों में इस कमी को उजागर किया गया; हालांकि शिक्षा मंत्रालय के लिए बजट आवंटन बढ़ाया गया है, लेकिन ये असल जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी नहीं है।
पूरे देश में लाखों छात्र लगातार परीक्षा के पेपर लीक होने की समस्या से जूझ रहे हैं। हाल के वर्षों में, नीट (2024 और 2026) सहित कई प्रमुख प्रवेश परीक्षाओं में पेपर लीक होने की घटनाएं सामने आई हैं, जिनसे लाखों उम्मीदवार प्रभावित हुए हैं।
अलग-अलग राज्यों में कॉम्पिटिटिव भर्ती और स्कूल बोर्ड परीक्षाओं के दौरान ऐसी घटनाएं अक्सर देखने को मिल रही हैं। पेपर लीक की घटनाएं अब इक्का-दुक्का मामलों से बढ़कर एक संगठित उद्योग का रूप ले चुकी हैं।
पिछले 7-8 सालों में पेपर लीक के 70 से अधिक मामले सामने आए, जिनसे लाखों छात्र प्रभावित हुए। हालांकि गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन दोषियों को सजा मिलने की दर बहुत कम है। इस वजह से सिस्टम पर छात्रों का भरोसा अब डगमगा रहा है।
सरकार ने सजा का प्रावधान करने के लिए 'सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024' लागू किया और 2026 में इसमें और संशोधन किए। हालांकि, इस कानून के बावजूद पेपर लीक की घटनाएं बंद नहीं हुई हैं।
एंटी-पेपर लीक बिल 2026 के तहत 5 से 10 साल की जेल और 10 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। इसका मकसद 60 दिनों के अंदर जांच और 3 महीने के अंदर ट्रायल पूरा करना है; इसके लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाए जाएंगे।
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यह दुर्भाग्य है कि आजादी के 79 साल बाद भी सरकार पेपर लीक होने के बाद उठाए जाने वाले कदमों और सजा के प्रावधानों को तो सख्त कर रही है, लेकिन पेपर लीक रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाएं, इस पर विचार नहीं कर रही है।
यह कानून घटना के बाद की कार्रवाई- जैसे गिरफ्तारी, मुकदमा और सजा सुनाना पर केंद्रित है, जबकि समस्या की जड़ें- जैसे पेपर तैयार करने, छपाई, परिवहन और वितरण प्रक्रिया; एजेंसियों और संगठित गिरोहों की घुसपैठ अभी भी बनी हुई हैं।
विशेषज्ञों का तर्क है कि समस्या केवल कानून में नहीं, बल्कि परीक्षा प्रक्रिया, एजेंसियों की कमज़ोर निगरानी और सिस्टम की कमियों में है। इसके अतिरिक्त, बजट की कमी का सीधा असर स्कूलों और कॉलेजों के बुनियादी ढांचे पर पड़ रहा है।
शिक्षा मंत्रालय के यूडीआईएसई+ 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, देश में लगभग 1,00,843 सरकारी स्कूल केवल एक शिक्षक के साथ चल रहे हैं; हालांकि, पिछले 12 सालों में शिक्षकों की कुल संख्या बढ़कर 1.02 करोड़ हो गई है।
कई राज्यों में हजारों टीचिंग पद खाली पड़े हैं। बुनियादी सुविधाओं की बात करें तो 95% स्कूलों में बिजली है, 99.5% में पीने का पानी है और 98.5% में लड़कियों के लिए टॉयलेट की सुविधा है; फिर भी, हजारों स्कूलों में ये सुविधाएं भी नहीं हैं।
सरकारी स्कूलों में दाखिले 2023-24 में 12.75 करोड़ से घटकर 2025-26 में 11.89 करोड़ हो गए, जबकि प्राइवेट बिना सरकारी मदद वाले स्कूलों में दाखिले बढ़कर लगभग 9.89 करोड़ हो गए, जो प्राइवेट स्कूलों के प्रति बढ़ती पसंद को दिखाता है।
छात्रों की निराशा अब सड़कों पर आ गई है। 2026 में नीट पेपर लीक के बाद, पूरे देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। युवाओं ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग की और सिस्टम को बेहतर बनाने के लिए आवाज उठाई।
परीक्षा रद्द होने और दोबारा परीक्षा के दबाव में कई छात्रों ने आत्महत्या की। ये घटनाएं शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं को उजागर करती हैं। संसदीय पैनल ने भी घटते नामांकन, स्कूलों के बंद होने और फंड के कम इस्तेमाल पर चिंता जताई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कानून बनाने और टास्क फोर्स गठित करने से समस्या का समाधान नहीं होगा। परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, बजट में भारी वृद्धि, शिक्षकों की भर्ती और बुनियादी ढांचे में गंभीर निवेश आवश्यक है।
इन ठोस कदमों के बिना, 'कागजी' दावे केवल कागज तक ही सीमित रहेंगे। देश ज्ञान के क्षेत्र में महाशक्ति बनने का सपना देख रहा है। लेकिन अगर छात्र पेपर लीक और संसाधनों की कमी से जूझते रहे, तो यह सपना अधूरा ही रह जाएगा।
भारत 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारियों में जुटा है, वहीं दूसरी तरफ देश की युवा पीड़ी शिक्षा व्यवस्था की बदहाली को लेकर सरकार पर सवाल उठा रहे हैं- पहले दिल्ली के जंतर-मंतर फिर झारखंड और अब देश के हर कोने में।
'विकसित भारत @2047' के नारों के बीच, जमीनी हकीकत यह है कि देश की पूरी परीक्षा व्यवस्था विश्वसनीयता के संकट से जूझ रही है। चाहे स्कूली स्तर हो, उच्च शिक्षा हो या भर्ती परीक्षाएं- केंद्र और राज्यों, दोनों के ही दावे खोखले नजर आते हैं।