उत्तराखंड में संस्कृत भाषा के उत्थान व विकास के लिए उच्च स्तरीय आयोग किया जाएगा गठित - सीएम पुष्कर सिंह धामी
Press Trust of India | December 2, 2025 | 03:22 PM IST | 2 mins read
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि संस्कृत विद्यार्थियों के लिए सरकारी सहायता, शोध कार्यों में सहयोग और रोजगार के अवसर बढ़ाने पर भी कार्य किया जा रहा है।
देहरादून: उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 1 दिसंबर को संस्कृत भाषा के उत्थान व विकास के लिए एक उच्च स्तरीय आयोग के गठन की घोषणा की। मुख्यमंत्री ने हरिद्वार में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन को संबोधित करते हुए यह घोषणा की।
उन्होंने कहा कि विश्व की अनेक भाषाओं की जड़ें संस्कृत से जुड़ी हुई हैं और वेद, पुराण, उपनिषद, आयुर्वेद, योग, दर्शन, गणित, साहित्य, विज्ञान व खगोलशास्त्र जैसे सभी प्राचीन ग्रंथ संस्कृत में रचे गए, जिसने भारत की वैचारिक धरोहर को समृद्ध किया।
मुख्यमंत्री ने 18वीं और 19वीं शताब्दी में यूरोपीय विद्वानों की संस्कृत साहित्य में बढ़ती रुचि का भी उल्लेख किया और कहा कि तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे विश्वविद्यालयों ने संस्कृत आधारित ज्ञान को विश्व में प्रसारित किया।
उन्होंने कहा कि भारत में चरक, सुश्रुत, आर्यभट्ट, भास्कराचार्य, चाणक्य, ब्रह्मगुप्त और पाणिनि जैसे महान विद्वानों ने जन्म लिया। धामी ने कहा कि वेदों और ऋषि-मुनियों के ज्ञान को जन्म देने वाली उत्तराखंड की पावन भूमि में संस्कृत को समृद्ध करना हमारा कर्तव्य है।
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मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया गया है जबकि विद्यालयों में भी संस्कृत शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार सतत प्रयासरत है।
उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार ने प्रत्येक जिले में आदर्श संस्कृत ग्राम स्थापित करने का संकल्प लिया और संस्कृत विद्यार्थियों के लिए सरकारी सहायता, शोध कार्यों में सहयोग और रोजगार के अवसर बढ़ाने पर भी कार्य किया जा रहा है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्होंने भी कक्षा नौ तक संस्कृत का अध्ययन किया और उस दौरान सीखे गए श्लोक, व्याकरण एवं भाषा की मधुरता आज भी उनकी स्मृति में है। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति में संस्कृत को आधुनिक और व्यवहारिक भाषा के रूप में स्थापित करने पर विशेष बल दिया गया है।
धामी ने कर्नाटक के मट्टूर गांव का उदाहरण देते हुए कहा कि संस्कृत आज भी दैनिक जीवन की भाषा बन सकती है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि एक दिन संस्कृत केवल पूजा-पाठ की भाषा न रहकर आम बोलचाल की भाषा के रूप में भी स्थापित होगी।
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