Santosh Kumar | June 11, 2026 | 03:30 PM IST | 2 mins read
सीजेपी संस्थापक अभिजीत दीपके ने कहा कि पुणे से शुरू हो रहे इस राष्ट्रीय अभियान को वे जयपुर, लखनऊ, अमृतसर और बेंगलुरु समेत कई शहरों तक ले जाएंगे और 20 जून को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर इकट्ठा होंगे।

पुणे: कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने कहा कि उनकी पार्टी आज अपना शिक्षा घोषणापत्र जारी करेगी, जिससे परीक्षा में कथित अनियमितताओं के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन की शुरुआत होगी। उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग भी दोहराई। दीपके ने बताया कि जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी इस शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन में शामिल होंगे, जो शाम को सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी कैंपस से शुरू होगा।
उन्होंने कहा कि घोषणापत्र में पेपर लीक रोकने, समय पर परिणाम जारी करने, भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं में पारदर्शिता बढ़ाने, प्राधिकरणों की जवाबदेही मजबूत करने और छात्रों की समस्याओं का समाधान करने पर विशेष जोर दिया गया।
सीजेपी संस्थापक अभिजीत दीपके ने कहा कि पुणे से शुरू हो रहे इस राष्ट्रीय अभियान को वे जयपुर, लखनऊ, अमृतसर और बेंगलुरु समेत कई शहरों तक ले जाएंगे और 20 जून को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर इकट्ठा होंगे।
उन्होंने कहा कि शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तक आंदोलन जारी रहेगा। साथ ही उन्होंने दावा किया कि सरकार बातचीत करने के बजाय सीजेपी के सोशल मीडिया अकाउंट निलंबित कर रही है, जबकि वे बातचीत के लिए तैयार हैं।
अभिजीत दीपके ने आगे कहा, ''सीजेपी देश के लिए एक बड़ा संदेश है। सरकार युवाओं की अनदेखी नहीं कर सकती। हमें फर्जी कहने के बजाय युवाओं की समस्याओं और मुद्दों को समझने की कोशिश कीजिए।''
हाल के सप्ताहों में यह समूह परीक्षा संबंधी मुद्दों को लेकर सोशल मीडिया अभियानों के माध्यम से चर्चा में आया है और खुद को शिक्षा क्षेत्र में सुधार की मांग करने वाले युवाओं के नेतृत्व वाले मंच के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।
इस संगठन ने 6 जून को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर भी प्रदर्शन किया था, जिसमें छात्रों और युवाओं ने प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के लिए जवाबदेही और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की थी।
आंदोलन में शामिल लोगों ने बताया कि परीक्षाओं को लेकर बार-बार सामने आने वाले विवाद, परिणामों को लेकर अनिश्चितता और अधिकारियों की जवाबदेही की कमी ने व्यवस्था पर उनका भरोसा कमजोर कर दिया है।
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