Abhay Pratap Singh | September 23, 2026 | 06:49 PM IST | 2 mins read
अध्ययन में यमुना नदी के केवल एक सीमित हिस्से को शामिल किया गया है। यमुना लगभग 1,379 किमी लंबी नदी है, जो सात राज्यों से होकर गुजरती है।

नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष दिनबंधु साहू के नेतृत्व में रिसर्च टीम ने दैनिक आहार में शामिल की जाने वाली विभिन्न सामान्य सब्जियों का परीक्षण किया। अध्ययन में पाया गया कि विभिन्न फसलों की जड़ें भारी धातुओं को अलग-अलग मात्रा में अवशोषित करती हैं। इसके कारण सब्जियों में इन धातुओं का अत्यधिक जैव-संचयन (bioaccumulation) पाया गया।
Elsevier Publications की पत्रिका Energy Nexus में प्रकाशित एक नए व्यापक अध्ययन में नई दिल्ली में यमुना नदी के किनारे स्थित कृषि क्षेत्रों की मिट्टी और वहां उगाई जाने वाली सब्जियों में भारी धातु प्रदूषण का खुलासा हुआ है। अध्ययन में बिना उपचार किए गए अपशिष्ट जल से सिंचाई के कारण स्थानीय स्तर पर उत्पादित सब्जियों के सेवन से गैर-कैंसरकारी तथा कैंसरकारी स्वास्थ्य जोखिम सामने आए हैं।
अध्ययन में यमुना नदी के केवल एक सीमित हिस्से को शामिल किया गया है। यमुना लगभग 1,379 किमी लंबी नदी है, जो सात राज्यों से होकर गुजरती है।
अध्ययन के अनुसार, दिल्ली यमुना नदी के कुल जलग्रहण क्षेत्र का केवल लगभग 1 प्रतिशत हिस्सा है, लेकिन राजधानी से नदी में पहुंचने वाला प्रदूषण उसके कुल प्रदूषण भार का करीब 70–80 प्रतिशत है।
दिल्ली के आसपास के पेरी-अर्बन क्षेत्रों में कई किसान सिंचाई के लिए प्रदूषित यमुना जल का इस्तेमाल करते हैं। इससे मोलिब्डेनम, एल्युमिनियम, जिंक, निकेल, क्रोमियम, कैडमियम और सीसा जैसी खतरनाक भारी धातुएं कृषि मिट्टी और खाद्य श्रृंखला में पहुंच रही हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार, परीक्षण की गई लगभग सभी सब्जियों में मोलिब्डेनम का आहार के माध्यम से अत्यधिक सेवन गैर-कैंसरकारी स्वास्थ्य जोखिम का प्रमुख कारण पाया गया। वहीं, इन सब्जियों के सेवन से कैंसरकारी जोखिम भी निर्धारित सुरक्षित स्तर से अधिक पाया गया, जिसमें मुख्य रूप से निकेल और क्रोमियम का योगदान रहा।
प्रो साहू ने कहा कि अध्ययन में पाए गए भारी धातुओं के स्तर Food and Agriculture Organization (FAO) द्वारा निर्धारित अनुमेय सीमाओं से कई गुना अधिक हैं। तत्काल जोखिम को कम करने के लिए शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि ज्ञात प्रदूषण-प्रभावित क्षेत्रों में किसानों को ऐसी फसलों की खेती की ओर स्थानांतरित किया जाना चाहिए, जिनमें भारी धातुओं के संचय की प्रवृत्ति कम हो।
अध्ययन में कहा गया है कि क्षेत्र में दीर्घकालिक कृषि स्थिरता और सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए तत्काल और समन्वित हस्तक्षेप आवश्यक है। प्रो साहू ने कहा, “प्रदूषण-प्रभावित क्षेत्रों में मिट्टी और फसलों की निरंतर सरकारी निगरानी तथा नदी के स्रोत पर प्रदूषण नियंत्रण के नियमों का कड़ाई से पालन करने की आवश्यकता है।”
शोध दल ने वनस्पति विज्ञान, पर्यावरण अभियांत्रिकी और माइक्रोबायोम अनुसंधान जैसे विभिन्न क्षेत्रों की विशेषज्ञता को एक साथ लाते हुए इस बहुआयामी अध्ययन को पूरा किया। इस शोध का नेतृत्व प्रो. दिनबंधु साहू ने किया, जबकि धर्मेंद्र कुमार, संजुक्ता साहू और शिवांकर अग्रवाल ने उनके साथ मिलकर अध्ययन में योगदान दिया।