NEET Exams: चिकित्सकों के संगठन ने परसेंटाइल के बजाय रैंक-आधारित नीट-पीजी, नीट-एसएस प्रणाली का स्वागत किया

Press Trust of India | November 4, 2026 | 06:07 PM IST | 2 mins read

एनएमसी ने स्नातकोत्तर (पीजी) और सुपर-स्पेशियलिटी (एसएस) चिकित्सा पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए, मौजूदा परसेंटाइल-आधारित व्यवस्था की जगह रैंक-आधारित मेधा प्रणाली लागू करने को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है।

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प्रस्तावित प्रणाली को अभी एनएमसी नियमों के जरिए अधिसूचित किया जाना बाकी है। (प्रतीकात्मक-मैग्निफिक)

नई दिल्ली: इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने स्नातकोत्तर चिकित्सा पाठ्यक्रमों के लिए दाखिले में योग्यता और न्यूनतम शैक्षणिक मानकों से कोई समझौता नहीं किये जाने पर जोर देते हुए कहा कि 'नीट-पीजी' और 'नीट-एसएस' के लिए राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी) द्वारा प्रस्तावित रैंक-आधारित व्यवस्था, पात्रता और मरीजों की सुरक्षा की कीमत पर खाली सीटों को भरने का जरिया नहीं बने। एनएमसी ने पीजी और एसएस चिकित्सा पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए, मौजूदा परसेंटाइल-आधारित व्यवस्था की जगह रैंक-आधारित मेधा प्रणाली लागू करने को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है।

इसके तहत, परिणामों में केवल रैंक घोषित की जाएगी, न कि परसेंटाइल स्कोर। प्रस्तावित प्रणाली को अभी एनएमसी नियमों के जरिए अधिसूचित किया जाना बाकी है। हितधारकों से परामर्श के लिए मसौदा नियम जारी किए जाने की उम्मीद है।

चिकित्सकों के संगठन ने इस प्रस्ताव का स्वागत किया। हालांकि, उन्होंने कहा कि केवल रैंक-आधारित प्रणाली से बदल देने से, खाली पड़ी पीजी सीटों और पात्रता मानकों में गिरावट से जुड़ी मूल चिंताओं का समाधान नहीं होगा।

आईएमए के अध्यक्ष ने क्या कहा?

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार जे. नायक ने कहा, ''चिकित्सा शिक्षा का उद्देश्य केवल सीटें भरना नहीं है, बल्कि ऐसे कुशल विशेषज्ञ तैयार करना है जो लोगों की जान बचाने के लिए जिम्मेदार हों।''

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पात्रता और न्यूनतम शैक्षणिक अर्हता के मामले में कोई समझौता नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि खाली सीटों को भरने के लिए पात्रता मानकों में मनमाने ढंग से ढील देकर किसी भी उम्मीदवार को पीजी चिकित्सा शिक्षा के लिए पात्र नहीं बनाया जाना चाहिए।

यह प्रस्ताव, जो उच्चतम न्यायालय को 12 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति द्वारा दी गई सिफारिशों का हिस्सा है, इसका उद्देश्य काउंसलिंग चरण के बीच होने वाली देरी को कम करना और तय शैक्षणिक कैलेंडर के भीतर प्रवेश प्रक्रिया को पूरा करने में मदद करना है।

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परसेंटाइल में बार-बार कटौती को लेकर चिंता

पीजी मेडिकल सीटों के खाली रहने के मुद्दे और अर्हता हासिल करने के लिए जरूरी परसेंटाइल में बार-बार की जा रही कटौती को लेकर चिंता पैदा हो गई है। चिकित्सकों का कहना है कि इस तरह की छूट से बहुत कम या नेगेटिव स्कोर वाले उम्मीदवार भी दाखिला पा सकते हैं। आईएमए का कहना है कि मानकों में छूट देने के बजाय, सीटों के खाली रहने के कारणों की जांच की जानी चाहिए।

आईएमए मुख्यालय के वित्त सचिव डॉ. पीयूष जैन ने कहा, ''खाली सीटों की समस्या से निपटने के लिए उनके मूल कारणों की पहचान की जानी चाहिए। इन कारणों में अत्यधिक शुल्क, अपर्याप्त बुनियादी ढांचा, संकाय सदस्यों की कमी, वजीफे में असमानता और कुछ खास विशेषज्ञता में काम करने के लिए अच्छे हालात न होना शामिल हैं।''

एसोसिएशन ने कहा, ''हर पीजी सीट निष्पक्ष प्रक्रिया के जरिए भरी जानी चाहिए, लेकिन ऐसा कभी मेधा, मेडिकल योग्यता और मरीजों की सुरक्षा की कीमत पर नहीं होना चाहिए।''

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