Press Trust of India | September 29, 2026 | 08:15 AM IST | 2 mins read
पीठ ने निर्देश दिया कि अगर न्यायिक अधिकारियों द्वारा जांच रिपोर्ट तैयार कर ली गई है तो उसे 29 सितंबर, 2026 को अपील पर दोबारा सुनवाई के दौरान सीलबंद लिफाफे में अदालत के समक्ष पेश किया जाए।

नई दिल्ली: इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad HC) ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (RPNL University) प्रयागराज में जातिगत भेदभाव के आरोपों से संबंधित एक रिट याचिका की सुनवाई पर रोक लगाते हुए न्यायिक अधिकारियों से जांच कराने के एकल न्यायाधीश के आदेश पर सवाल उठाया। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति कुणाल रवि सिंह की खंडपीठ ने कहा कि प्रथम दृष्टया इन आरोपों की जांच विश्वविद्यालय के आंतरिक समान अवसर प्रकोष्ठ द्वारा की जानी चाहिए, न कि न्यायिक अधिकारियों द्वारा।
अदालत ने यह आदेश डॉ. दीपक शर्मा द्वारा दायर विशेष अपील पर 23 सितंबर, 2026 को सुनवाई के दौरान जारी किया। पीठ ने कहा कि जब विश्वविद्यालय में समान अवसर प्रकोष्ठ मौजूद है और याचिकाकर्ताओं ने अपीलकर्ता को बाहर रखते हुए उसी प्रकोष्ठ के माध्यम से जांच कराने का अनुरोध किया था, तो न्यायिक अधिकारियों से जांच कराने का कोई औचित्य नहीं है।
अदालत ने कहा, “भले ही ये आरोप गंभीर प्रकृति के हैं लेकिन उचित तरीके से गठित समान अवसर प्रकोष्ठ के माध्यम से इनकी जांच कराने के विश्वविद्यालय के अधिकार को छीना नहीं जाना चाहिए था क्योंकि विद्यार्थियों का कल्याण देखना और ऐसी परिस्थितियों से निपटना विश्वविद्यालय के अधिकार क्षेत्र में आता है।”
पीठ ने निर्देश दिया कि अगर न्यायिक अधिकारियों द्वारा जांच रिपोर्ट तैयार कर ली गई है तो उसे 29 सितंबर, 2026 को अपील पर दोबारा सुनवाई के दौरान सीलबंद लिफाफे में अदालत के समक्ष पेश किया जाए। यह मामला एक पीएचडी शोधार्थी और बीए-एलएलबी के पांचवें सेमेस्टर के एक छात्र द्वारा विधि विभागाध्यक्ष व छात्रावास के वार्डन डॉ. दीपक शर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोपों से संबंधित है।
छात्रों ने आरोप लगाया कि जाति आधारित उत्पीड़न के लिए अकादमिक और प्रशासनिक अधिकारों का इस्तेमाल किया गया।
इससे पहले 16 सितंबर को एकल पीठ ने छात्रों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए प्रयागराज के न्यायिक अधिकारियों को मामले की जांच कर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया था। डॉ. शर्मा ने एकल न्यायाधीश के आदेश को चुनौती देते हुए विशेष अपील दायर की। अपीलकर्ता की ओर से कहा गया कि जब विश्वविद्यालय में समान अवसर प्रकोष्ठ मौजूद है तो न्यायिक अधिकारियों से जांच कराने की कोई आवश्यकता नहीं है।