Allahabad High Court: अनुदानित परास्नातक शिक्षा के बाद डॉक्टर अनिवार्य सरकारी सेवा बॉन्ड से बच नहीं सकते

Press Trust of India | September 22, 2026 | 12:57 PM IST | 2 mins read

आदेश के अनुसार अदालत ने चिकित्सा शिक्षा और प्रशिक्षण महानिदेशक को निर्देश दिया कि वह डॉक्टर के लिए नई 'काउंसलिंग' आयोजित करें और उन्हें सरकारी मेडिकल कॉलेजों और 'नेशनल मेडिकल कमीशन' से मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में उपलब्ध खाली जगहों में से चुनने का मौका दें।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि अनुदानित परास्नातक शिक्षा के बाद डॉक्टर अनिवार्य सरकारी सेवा बॉन्ड से बच नहीं सकते। (प्रतीकात्मक-विकिमीडिया कॉमन्स)

लखनऊ: इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने कहा है कि सरकारी संस्थानों में अनुदानित दरों पर मेडिकल परास्नातक की शिक्षा ग्रहण करने वाले डॉक्टर अपने दाखिले के साथ जुड़े अनिवार्य सरकारी सेवा बॉन्ड से बच नहीं सकते। न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने सोमवार को कहा कि दो साल की अनिवार्य सरकारी सेवा की शर्त का उद्देश्य सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करना और मरीजों के जीवन के अधिकार की रक्षा करना है।

खंडपीठ ने कहा कि तैनाती देने में सिर्फ प्रशासनिक विलम्ब होने से बॉन्ड के प्रति आबद्धता खत्म नहीं हो जाती। पीठ ने यह आदेश लखनऊ के संजय गांधी परास्नातक आयुर्वेद विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) से 'ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन' में 'एमडी' (परास्नातक) का पाठ्यक्रम पूरा करने वाली डॉक्टर अपरूपा सेन गुप्ता की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।

याचिकाकर्ता की दलील पर कोर्ट का जवाब

सेन गुप्ता की दलील थी कि चूंकि सरकार ने उनका पाठ्यक्रम पूरा होने के 3 महीने के भीतर उन्हें तैनाती नहीं दी इसलिए उनके दो साल के अनिवार्य सेवा बॉन्ड को समाप्त माना जाना चाहिए। अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया और कहा कि डॉक्टर ने पाठ्यक्रम करने के लिए सरकार से 'अनापत्ति प्रमाणपत्र' (एनओसी) लिया था।

आदेश के अनुसार, प्रमाणपत्र में साफ तौर पर कहा गया था कि पाठ्यक्रम करने के दौरान गुजरा समय उनकी बॉन्ड सेवा में नहीं गिना जाएगा। खंडपीठ ने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश में ऐसा कोई नियम नहीं है जिसके तहत तीन महीने के भीतर तैनाती नहीं मिलने पर डॉक्टर को बॉन्ड की शर्तों से स्वत: मुक्ति मिल जाए।

हालांकि उच्च न्यायालय ने उस तरीके पर आपत्ति जताई जिससे डॉक्टर को बॉन्ड सेवा के लिए काउंसलिंग में शामिल होने का मौका नहीं दिया गया। अदालत ने इस बात पर गौर किया कि एक जून 2026 की 'काउंसलिंग' संबंधी अधिसूचना एमडी/एमए अभ्यर्थियों के 2022 बैच और डिप्लोमा अभ्यर्थियों के 2023 बैच के लिए था, जबकि याचिकाकर्ता 2021 बैच की थी।

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जारी किया निर्देश

आदेश के अनुसार अदालत ने चिकित्सा शिक्षा और प्रशिक्षण महानिदेशक को निर्देश दिया कि वह डॉक्टर के लिए नई 'काउंसलिंग' आयोजित करें और उन्हें सरकारी मेडिकल कॉलेजों और 'नेशनल मेडिकल कमीशन' से मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में उपलब्ध खाली जगहों में से चुनने का मौका दें।

खंडपीठ पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि वह 27 सितंबर 2026 से चार हफ्ते के अंदर यह प्रक्रिया पूरी करे। पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद डॉक्टर सेन गुप्ता ने संजय गांधी परास्नातक आयुर्विज्ञान संस्थान में 'सीनियर रेजिडेंट' के तौर पर जो 89 दिन काम किया था, उसे उनके दो साल के अनिवार्य सरकारी सेवा बॉन्ड के तहत निर्धारित अवधि में समायोजित किया जाए।

खंडपीठ ने कहा कि जब तक नई 'काउंसलिंग' पूरी नहीं हो जाती, तब तक डॉक्टर सेन गुप्ता एसजीपीजीआई में 'सीनियर रेजिडेंट' के तौर पर काम करती रहेंगी।

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