Saurabh Pandey | July 8, 2026 | 10:42 AM IST | 4 mins read
शिक्षा मंत्रालय की UDISE+ रिपोर्ट 2025-26 के अनुसार, देश के स्कूलों में कुल 24.72 करोड़ छात्र नामांकित हैं और 1.03 करोड़ शिक्षक कार्यरत हैं। इस नए सर्वे में स्कूलों के बुनियादी ढांचे में मजबूती आने के साथ-साथ छात्राओं की भागीदारी में बड़ा सुधार देखा गया है।

नई दिल्ली : केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग द्वारा वर्ष 2025-26 की एकीकृत जिला शिक्षा सूचना प्रणाली प्लस (UDISE+) रिपोर्ट जारी कर दी गई है। यह रिपोर्ट भारतीय स्कूली शिक्षा प्रणाली की वर्तमान स्थिति, बुनियादी ढांचे, छात्रों के नामांकन और शिक्षकों की संख्या का एक व्यापक और विस्तृत खाका पेश करती है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के सुझावों के अनुरूप, इस बार की रिपोर्ट में "एक राष्ट्र, एक डेटाबेस" की परिकल्पना को साकार करते हुए स्कूल-वार डेटा के बजाय प्रत्येक व्यक्तिगत छात्र के डेटा को ट्रैक करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय स्कूली शिक्षा प्रणाली दुनिया की सबसे बड़ी शिक्षा प्रणालियों में से एक बनी हुई है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के मुख्य आंकड़े निम्नलिखित हैं:
शिक्षा व्यवस्था में समानता और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए सभी वर्गों की भागीदारी को दर्ज किया गया है। राष्ट्रीय स्तर पर नामांकित कुल छात्रों में से 48.4% छात्राएं हैं। सभी स्तरों पर जेंडर पैरिटी इंडेक्स (GPI) 1 से ऊपर रहा है, जो लड़कों की तुलना में लड़कियों की उच्च भागीदारी को दर्शाता है।
सामाजिक श्रेणी के आधार पर छात्रों का वितरण
इसके अतिरिक्त, कुल नामांकन में अल्पसंख्यक समुदायों की हिस्सेदारी 20% से अधिक है, जिसमें मुस्लिम छात्रों का प्रतिशत 16.2% है। साथ ही, विशेष आवश्यकता वाले बच्चों (CWSN) की संख्या 22,11,226 दर्ज की गई है।
फर्जी या डुप्लिकेट छात्रों को हटाने और सरकारी योजनाओं (जैसे समग्र शिक्षा, पीएम पोषण और राष्ट्रीय छात्रवृत्ति) का लाभ सीधे सही लाभार्थियों तक पहुंचाने के लिए आधार और विशिष्ट शैक्षणिक आईडी (EID) को बढ़ावा दिया गया है। देश के 90.2% छात्रों ने स्वेच्छा से अपना आधार नंबर प्रदान किया है। आंध्र प्रदेश और लक्षद्वीप 99.6% आधार सीडिंग के साथ देश में सबसे आगे हैं। मेघालय (35.3%), नागालैंड (65.1%) और मणिपुर (69.2%) इस सूची में सबसे निचले पायदान पर हैं।
NEP 2020 के तहत स्कूलों में सुरक्षित और सुखद माहौल देने के लिए बुनियादी सुविधाओं को सुदृढ़ किया गया है। राष्ट्रीय स्तर पर स्कूलों में उपलब्ध प्रमुख सुविधाएं इस प्रकार हैं-
बुनियादी सुविधा | उपलब्धता प्रतिशत (%) |
पेयजल सुविधा | 99.5% |
शौचालय सुविधा | 99.1% |
लड़कियों के लिए क्रियाशील शौचालय | 98.5% |
लड़कों के लिए क्रियाशील शौचालय | 97.2% |
हाथ धोने की सुविधा | 96.9% |
बिजली कनेक्शन | 95.0% |
पुस्तकालय/रीडिंग कॉर्नर | 90.5% |
खेल का मैदान | 81.9% |
कंप्यूटर सुविधा | 69.9% |
इंटरनेट सुविधा | 67.4% |
दिव्यांगों के लिए रैंप सुविधा | 58.2% |
डिजिटल ट्रैकिंग के चलते अब स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की सटीक पहचान संभव हो सकी है। रिपोर्ट के अनुसार, प्राथमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर बेहद मामूली यानी 0.3% है। उच्च प्राथमिक स्तर पर यह 3.6% और माध्यमिक स्तर पर 9.5% है। वहीं दूसरी ओर, रिटेंशन रेट (कक्षा 1 में प्रवेश लेने वाले बच्चों का आगे की कक्षाओं में बने रहना) प्राथमिक स्तर पर 91.1%, एलीमेंट्री पर 83.7%, माध्यमिक पर 69.8% और हायर सेकेंडरी स्तर तक आते-आते 51.9% रह जाता है। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि उच्च शिक्षा के स्तर पर अभी भी छात्रों को स्कूल में रोके रखने के लिए और अधिक प्रयासों की आवश्यकता है।
रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि देश के कुछ राज्यों में स्कूलों और छात्रों के अनुपात में बड़ा असंतुलन है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में नामांकित छात्रों के प्रतिशत की तुलना में उपलब्ध स्कूलों की संख्या अधिक है, जो संसाधनों के कम उपयोग को दर्शाता है। इसके विपरीत, महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल और दिल्ली जैसे राज्यों में स्कूलों की संख्या के मुकाबले छात्रों का नामांकन बहुत अधिक है, यानी यहां प्रति स्कूल छात्रों का दबाव ज्यादा है। दिल्ली और चंडीगढ़ में प्रति स्कूल छात्रों की संख्या सबसे अधिक है, लेकिन वहां का बुनियादी ढांचा और छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR) मानदंडों के भीतर बेहद शानदार है।