Saurabh Pandey | June 25, 2026 | 11:40 AM IST | 3 mins read
NCERT ने 50 साल बाद ऐतिहासिक कदम उठाते हुए कक्षा 9वीं की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में 1975 के 'आपातकाल' (Emergency) को इतिहास के एक 'काले दौर' और लोकतंत्र की बड़ी चुनौती के रूप में शामिल किया है।

नई दिल्ली : देश में आपातकाल लागू होने के लगभग 50 साल बाद, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने पहली बार कक्षा 9वीं की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में इस विषय को शामिल किया है। नई पाठ्यपुस्तक "Understanding Society: India and Beyond" में आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र के सामने आई "सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक" के रूप में वर्णित किया गया है। NCERT के एक अधिकारी ने पुष्टि की है कि यह पहली बार है जब कक्षा 9वीं के छात्रों के लिए आपातकाल पर एक विशेष खंड जोड़ा गया है।
यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब देश ने हाल ही में 1975 में घोषित आपातकाल के 50 वर्ष पूरे किए हैं। पाठ्यपुस्तक में उन घटनाओं और कारणों को विस्तार से समझाया गया है जिनकी वजह से यह फैसला लिया गया और इसका लोकतांत्रिक अधिकारों पर क्या असर पड़ा। किताब के अनुसार, "1970 के दशक की शुरुआत में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ जनता में असंतोष बढ़ रहा था। बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई और कुशासन के आरोपों के कारण व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए।
इसके बाद जून 1975 में 'आंतरिक अशांति' के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल लगा दिया गया, जिसके दौरान नागरिकों के अधिकांश मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए, प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई और कई राजनीतिक नेताओं व कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया।
पाठ्यपुस्तक में आपातकाल के खिलाफ खड़े हुए 'लोकनायक' जयप्रकाश नारायण के जनआंदोलन पर विशेष जोर दिया गया है, जिन्होंने विशेष रूप से बिहार और गुजरात में छात्रों और नागरिकों को लामबंद किया था। 1977 में आपातकाल हटने और चुनावों में तत्कालीन सरकार की हार को किताब में भारतीय लोकतंत्र की असली ताकत बताया गया है।
इसी अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सोशल मीडिया के माध्यम से उन सभी लोगों को श्रद्धांजलि दी, जिन्होंने इस काले दौर में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की। पीएम मोदी ने कहा कि आपातकाल हमारे संविधान पर एक सीधा हमला था। यह नागरिक स्वतंत्रता के निलंबन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश, राजनीतिक नेताओं, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और उन संस्थानों पर हमले का गवाह था जो हमारे लोकतंत्र की रीढ़ हैं।" उन्होंने उन अनगिनत नागरिकों के असाधारण साहस की भी सराहना की, जिन्होंने चुप रहने से इनकार कर दिया और संविधान के आदर्शों को बनाए रखा।
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आपातकाल के ऐतिहासिक संदर्भ के अलावा, संशोधित पाठ्यपुस्तक वर्तमान समय में लोकतंत्र के सामने मौजूद अन्य चुनौतियों पर भी बात करती है। इसमें फेक न्यूज (झूठी खबरें), भ्रामक जानकारी (Misinformation), गरीबी, क्षेत्रवाद, सामाजिक भेदभाव और लैंगिक असमानता जैसे गंभीर विषयों को शामिल किया गया है।
इसके साथ ही, छात्रों को एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में उनकी भूमिका समझाने के लिए पहली बार ‘Democracy and You’ (लोकतंत्र और आप) नाम का एक नया सेक्शन जोड़ा गया है। किताब में मीडिया को "लोकतंत्र का चौथा स्तंभ" बताते हुए उसकी भूमिका को रेखांकित किया गया है। साथ ही, चुनाव प्रणाली, मतदाता भागीदारी, महिलाओं के मताधिकार, स्थानीय निकायों में उनके आरक्षण और गुजरात व त्रिपुरा की पंचायतों के उदाहरण देकर जमीनी स्तर पर लोकतंत्र के कामकाज को समझाया गया है।