Allahabad High Court: इलाहाबाद एचसी ने यूपीपीएससी को याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी पर विचार करने का दिया निर्देश

Press Trust of India | October 14, 2026 | 12:43 PM IST | 2 mins read

अदालत का मानना था, भर्ती करने वाले जिस अधिकारी ने खुद पंजीकृत डाक या स्पीड पोस्ट से आवेदन की प्रति भेजने का तरीका मंजूर किया हो, वह उसी तरीके से भेजने के परिणाम से इनकार नहीं कर सकता है।

अदालत ने 8 अक्टूबर को दिए अपने निर्णय में कहा कि आयोग ने डाक से आपूर्ति में मामूली विलंब के कारण आवेदन की प्रति लौटाकर गलती की। (इमेज-आधिकारिक वेबसाइट/UPPSC)

नई दिल्ली: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक निर्णय में कहा है कि समय पर ऑनलाइन आवेदन करने और निर्धारित अवधि के भीतर इस आवेदन की प्रति डाक से भेजने वाली एक उम्मीदवार को महज इसलिए चयन प्रक्रिया से बाहर नहीं किया जा सकता कि डाक से भेजी गई प्रति भर्ती अधिकारियों को कट-ऑफ तिथि के बाद मिली। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) को इस महिला याचिकाकर्ता के आवेदन की प्रति 16 अक्टूबर तक स्वीकार करने और चिकित्सा शिक्षा विभाग में भर्ती के लिए उसकी उम्मीदवारी पर विचार करने का निर्देश दिया।

अदालत का मानना था, “भर्ती करने वाले जिस अधिकारी ने खुद पंजीकृत डाक या स्पीड पोस्ट से आवेदन की प्रति भेजने का तरीका मंजूर किया हो, वह उसी तरीके से भेजने के परिणाम से इनकार नहीं कर सकता और ना ही किसी ऐसे उम्मीदवार को चयन प्रक्रिया से बाहर कर सकता है जिसने पूरी सावधानी बरती हो।”

तथ्यों के मुताबिक, 18 अगस्त, 2026 को जारी विज्ञापन में केवल साक्षात्कार के माध्यम से चिकित्सा शिक्षा विभाग में भर्ती के लिए आवेदन आमंत्रित किए जिसके लिए 1 सितंबर तक शुल्क के साथ ऑनलाइन आवेदन किया जाना था और आवश्यक दस्तावेजों के साथ आवेदन की प्रति पंजीकृत डाक या स्पीड पोस्ट के जरिए आयोग तक 15 सितंबर को शाम पांच बजे तक पहुंचनी थी।

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याचिकाकर्ता ने 31 अगस्त, 2026 को ऑनलाइन आवेदन किया और शुल्क जमा किया। उसने 8 सितंबर, 2026 को पंजीकृत डाक से इसकी प्रति भेजी जोकि आयोग के कार्यालय में 16 सितंबर को पहुंची। आयोग ने लिफाफा 21 सितंबर को याचिकाकर्ता को लौटा दिया। डाक अधिकारियों ने याचिकाकर्ता को सूचित किया कि नई दिल्ली में कार्यालय 11 सितंबर से 13 सितंबर तक 18वें ब्रिक्स सम्मेलन के कारण बंद थे।

आयोग को 30 सितंबर को इस संबंध में भेजे गए प्रतिवेदन पर कोई जवाब नहीं आया। सुनवाई के दौरान, आयोग के अधिवक्ता ने दलील दी कि आवेदन की प्रति अंतिम तिथि के बाद पहुंची जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने तय समय पर आवेदन की प्रति भेजी और उसकी तरफ से कोई लापरवाही नहीं हुई। इस तरह से, अदालत ने 8 अक्टूबर को दिए अपने निर्णय में कहा कि आयोग ने डाक से आपूर्ति में मामूली विलंब के कारण आवेदन की प्रति लौटाकर गलती की।

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