त्रि-भाषा नीति पर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का बयान, केंद्र किसी भी राज्य पर नहीं थोप रहा कोई भाषा
Santosh Kumar | September 21, 2025 | 07:43 PM IST | 2 mins read
धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि एक भाषा मातृभाषा होगी और बाकी दो छात्र अपनी पसंद से चुन सकेंगे। किसी राज्य पर भाषा नहीं थोपी जाएगी।
नई दिल्ली: केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि केंद्र सरकार किसी पर कोई भाषा नहीं थोप रही है। प्रधान ने उन लोगों को ‘‘राजनीति से प्रेरित’’ बताया जो यह दावा करते हैं कि केंद्र, राज्यों पर त्रि-भाषा नीति थोप रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पहली और दूसरी कक्षा में द्विभाषा फॉर्मूला होगा, जिसमें एक भाषा मातृभाषा होगी। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि तमिलनाडु में प्राथमिक स्तर पर तमिल पढ़ाना अनिवार्य है, जबकि राज्य अपनी पसंद की दूसरी भाषा चुन सकता है।
प्रधान ‘थिंक इंडिया दक्षिणापथ शिखर सम्मेलन 2025’ में शामिल होने के बाद पत्रकारों से बात कर रहे थे। त्रि-भाषा नीति के बारे में विस्तार से बताते हुए उन्होंने कहा कि कक्षा छठी से दसवीं तक त्रि-भाषा फार्मूला लागू है।
राज्य सरकारें भी त्रि-भाषा नीति लागू कर रही
प्रधान ने कहा कि एक भाषा मातृभाषा होगी और बाकी दो छात्र अपनी पसंद से चुन सकेंगे। किसी राज्य पर भाषा नहीं थोपी जाएगी। यूपी में भी त्रि-भाषा नीति लागू की जा रही है। कई गैर-भाजपा राज्य सरकारें भी त्रि-भाषा नीति लागू कर रही हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘यूपी में छात्र हिंदी को मातृभाषा के रूप में सीखेंगे। इसके बाद, वे मराठी और तमिल भी सीख सकते हैं। यूपी में कुछ छात्र तमिल को तीसरी भाषा के रूप में चुन सकते हैं। सरकार को तमिल पढ़ाने की सुविधा प्रदान करनी होगी।’’
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आगे क्या कहा?
प्रधान ने कहा कि देश की केवल 10% आबादी ही अंग्रेजी बोलती है, बाकी लोग अपनी मातृभाषा को प्राथमिकता देते हैं। आंध्र प्रदेश के सीएम ने कहा कि वह तेलुगु छात्रों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनने के लिए 10 भाषाएं सीखने के लिए प्रोत्साहित करेंगे।
उन्होंने कहा, ‘‘भाषा हमेशा एक साधन होती है। राजनीतिक रूप से संकीर्ण विचार रखने वाले लोग यह समस्या पैदा कर रहे हैं।’’ तमिलनाडु की अपनी पिछली यात्राओं का जिक्र करते हुए प्रधान ने कहा, ‘‘मैंने तमिलनाडु के सभी हिस्सों का दौरा किया है।
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि वे ओड़िया हैं और उन्हें अपनी भाषा के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं पर भी गर्व है। जो लोग भाषाई विभाजन पैदा करना चाहते थे, वे असफल हो गए हैं, क्योंकि समाज उनसे आगे निकल चुका है।
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