‘स्कूल में बच्चे पर धौंस जमाने से उसकी शिक्षा पर पड़ सकता है बुरा प्रभाव’ - अध्ययन
Press Trust of India | August 11, 2025 | 03:26 PM IST | 4 mins read
नार्वे के एक स्कूल में किए गए अध्ययन में पाया गया कि जब अभिभावकों को लगा कि उनके बच्चे को धौंस दी जा रही है तो दो-तिहाई बार ऐसा हुआ कि स्कूल इससे सहमत नहीं हुआ।
नई दिल्ली: स्कूलों में बच्चों पर धौंस जमाने का बहुत बुरा प्रभाव हो सकता है। अध्ययन में यह बात सामने आयी है कि इसके कारण बच्चों के शिक्षा प्रदर्शन में कमी आ सकती है तथा उन्हें अवसाद, उद्विग्नता की समस्या का सामना करना पड़ सकता है या उनके भीतर आत्महत्या की प्रवृत्तियां भी उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए लिए दूसरों पर धौंस जमाने की प्रवृत्ति की रोकथाम और इसे कम करना सरकार के साथ साथ परिवारों एवं स्कूलों की फौरी प्राथमिकता होनी चाहिए।
धौंस जमाने की प्रवृत्ति का सामना करने के लिए एक सामान्य अड़चन यह है कि अभिभावक एवं स्कूल प्राय: इस बात पर सहमत नहीं होते हैं कि कौन सी परिस्थिति में यह माना जाए कि धौंस जमायी गयी। नार्वे के एक स्कूल में किए गए अध्ययन में पाया गया कि जब अभिभावकों को लगा कि उनके बच्चे को धौंस दी जा रही है तो दो-तिहाई बार ऐसा हुआ कि स्कूल इससे सहमत नहीं हुआ। इस प्रकार के मामले भी सामने आये जब स्कूल ने कहा कि कोई बच्चा धौंस दे रहा है, किंतु बच्चे के अभिभावक ने इसे स्वीकार नहीं किया।
जब हम धौंस जमाने या धमकाने की परिभाषा पर विचार करते हैं तो इसे लेकर असहमति होना, आश्चर्यजनक नहीं है। धौंस जमाने के मामले की पहचान करना सरल नहीं है। आस्ट्रेलिया के स्कूलों में जो परिभाषा प्रयुक्त की जाती है, उसमें उन प्रमुख बिन्दुओं को शामिल किया गया है जिसे अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने परिभाषित किया है। धौंस जमाना एक प्रकार की ऐसी आक्रामकता होती है:- (1) जो पीड़ित को आहत करती है। (2) जिसकी पुनरावृत्ति कई बार होती है। (3) जो आहत करने की मंशा से की जाती है। (4) जिसमें ताकत का असंतुलन रहता है और पीड़ित समस्या को रोक पाने में असमर्थ महसूस करता है।
अध्ययन से इस बात का पता चला है कि जो अभिभावक इस बात की जानकारी देते हैं कि उनके बच्चे को धमकी दी गयी तो बाद में इस बात का जोखिम बढ़ जाता है कि उनका बच्चा उद्विग्नता और अवसाद का शिकार हो सकता है। इस स्थिति में इस बात का कोई असर नहीं पड़ता कि स्कूल यह बात मान रहा है कि बच्चे को धमकी दी गयी अथवा वह इस दावे से सहमत नहीं हो। लिहाजा, प्रारंभिक स्तर पर भले ही स्कूल इस बात से सहमत हो या न हो कि बच्चे को धमकी दी गयी है, यह महत्वपूर्ण होता है कि स्थिति में सुधार किया जाए।
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कई बार स्थिति का सामना करने के लिए कुछ कदम उठाकर स्कूल यह पता लगा सकता है कि धौंस दी गयी या नहीं। मिसाल के तौर कई बार छात्र इस प्रकार के अहानिकारक व्यवहार से परेशान हो सकता है, जैसे भिनभिनाने की आवाज निकालना, मेज थपथपाना या बहुत नजदीक खड़े हो जाता। यदि इस तरह का व्यवहार किसी को आहत करने की मंशा से नहीं किया गया है तो हम यह उम्मीद करते हैं बच्चा इस बात से अवगत होने पर अपने व्यवहार में सुधार ले आएगा। किंतु यह व्यवहार जारी रहता है या बढ़ जाता है तो इस बात को मानने का पुख्ता आधार होगा कि वह जानबूझ कर उकसाना चाहता है (जो धौंस जमाना ही है)।
अभिभावकों के लिए यह एक सहायक रणनीति हो सकती है वह बच्चों के अनुभवों का एक सतर्कतापूर्ण रिकार्ड बनाये, जिसमें यह बात लिखी हो कि बच्चों को क्या अनुभव हुआ और इससे उस पर क्या प्रभाव पड़ा। यह लंबे समय में आहत करने वाले व्यवहार के चलन को स्थापित करने में मददगार हो सकता है। अभिभावकों के लिए यह महत्वपूर्ण होता है कि वह स्कूल के साथ अच्छे व्यवहार एवं मौजूदा संवाद को कायम रखे (भले ही यह कठिन हो)।
धौंस जमाना एक जटिल और दिन प्रतिदिन बदलने वाला मुद्दा है, अच्छी तरह से संवाद रखने से मुद्दों को समुचित ढंग से निपटाया जा सकता है। अभिभावक बच्चों को स्थिति का सामना करने के लिए प्रशिक्षित कर सकते हैं। मिसाल के तौर पर उन्हें यह समझाया जाए कि जब उनका कोई मित्र या सहपाठी ऐसा व्यवहार कर रहा है जिसे वह पसंद नहीं करता तो इस बात को उसे मित्रतापूर्ण एवं विश्वस्त ढंग से कह देना चाहिए।
अभिभावकों को बच्चों को इस बात के लिए समझाना चाहिए कि उन्हें अध्यापकों से सहायता मांगने के लिए कब सोचना चाहिए। एक-दूसरे के साथ मिलकर और समय के साथ समस्या को समझ कर स्कूल एवं परिवार आहत करने वाले व्यवहार का मुकाबला कर सकते हैं। इसमें यह बात अधिक महत्वपूर्ण नहीं है कि दोनों पक्षों के बीच शुरुआत में इस बात को लेकर सहमति थी या नहीं कि ‘‘धमकी दी गयी।’’
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