राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की तैयारी, ‘लाडू’, ‘रोटलो’ और ‘मोटो बापो’ जैसे स्थानीय शब्द होंगे शामिल
Press Trust of India | March 22, 2026 | 03:45 PM IST | 3 mins read
शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने बताया कि कार्यक्रम की सफलता के बाद अब राज्य में बोली जाने वाली 11 स्थानीय भाषाओं की सामग्री तैयार की गई है।
जयपुर: राजस्थान में स्थानीय भाषा को बढ़ावा देने के लिए सरकारी विद्यालयों में अब लड्डू की जगह 'लाडू', रोटी की जगह 'रोटलो', बड़े पापा की जगह 'मोटो बापो' और रुपया की जगह 'पिया' जैसे स्थानीय शब्दों को शामिल कर छात्रों के लिए पढ़ाई को अधिक रोचक और सहज बनाया जाएगा।
राजस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (आरएससीईआरटी) की निदेशक श्वेता फगेड़िया ने बताया कि विभाग ने राजस्थान में बहुभाषी शिक्षा परियोजना शुरू की है जिसके तहत बच्चों को उनकी स्थानीय भाषा में पढ़ाया जाएगा।
उन्होंने बताया कि इसको राज्य के 11 जिलों में क्रियान्वित करने की योजना है और बाद में पूरे प्रदेश में लागू किया जाएगा। निदेशक ने बताया कि परिषद ने शिक्षा में भाषायी अंतर को समझने के लिए दो चरण में बोलियों का सर्वेक्षण कराया था।
20,298 प्राथमिक स्कूल सर्वेक्षण में शामिल
निदेशक ने बताया कि चरण 1 में 9 जिलों प्रतापगढ़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, चित्तौडगढ़़, राजसमंद, पाली, सिरोही और उदयपुर में यह सर्वेक्षण किया गया जिसमें 20,298 प्राथमिक स्कूलों के कक्षा 1 के 2,43,532 विद्यार्थियों के शिक्षकों को शामिल किया।
सर्वेक्षण में इन जिलों में बोली जाने वाली 31 से अधिक बोलियों की पहचान की गई जिसमें सामने आया कि वागड़ी और मेवाड़ी विद्यार्थियों द्वारा सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। उन्होंने बताया कि दूसरे चरण में 24 जिलों में सर्वेक्षण किया गया।
इस सर्वेक्षण के लिए डेटा इन जिलों में कक्षा एक को हिंदी भाषा पढ़ाने वाले शिक्षकों ने भरा। सर्वेक्षण में इन जिलों के 250 खंड में 41,686 विद्यालयों के कक्षा एक में पढ़ने वाले 3,66,782 विद्यार्थियों को शामिल किया गया।
बहुभाषी शिक्षा कार्यक्रम 200 विद्यालयों में
श्वेता ने बताया कि सर्वेक्षण का उद्देश्य विद्यालयों की सामाजिक भाषायी गतिशीलता को समझना और घर एवं विद्यालय के वातावरण के बीच भाषायी असमानताओं के कारण शिक्षा में पैदा होने वाली बाधाओं का आकलन करना था।
आरएससीईआरटी निदेशक ने बताया कि राज्य के भाषायी सर्वेक्षण के आधार पर प्रयोग के लिए डूंगरपुर और सिरोही का चयन किया गया। इन जिलों में भाषायी विविधता सर्वाधिक तथा घरेलू भाषा और विद्यालय की भाषा के बीच अंतर अधिक है।
यह परियोजना यूनिसेफ, 'रूम टू रीड' और 'लैंग्वेज एंड लर्निंग फाउंडेशन' के सहयोग से संचालित की जा रही है। अधिकारी ने बताया कि आरएससीईआरटी ने शुरुआत में बहुभाषी शिक्षा कार्यक्रम 200 विद्यालयों में लागू किया।
स्थानीय शब्दों के प्रयोग से पढ़ाई में रुचि बढ़ी
अधिकारी ने बताया कि सिरोही और डूंगरपुर के विद्यालयों में वागड़ी और गरासिया समुदाय की मातृभाषा के शब्दों का इस्तेमाल कर पढ़ाने से पढ़ाई में बच्चों की रुचि और समझ दोनों बढ़ी।
उन्होंने बताया कि वागड़ी बोली के 'पाणी', 'बापू', 'घरो', 'छोकरो', 'आवो' और 'रोटली' जैसे शब्दों तथा गरासिया बोली के आई (मां), बापो (पिता), मितर (दोस्त) जैसे शब्दों को शिक्षण में शामिल किया गया। इससे बच्चों के लिए पढ़ाई सहज हुई है।
अधिकारी ने बताया कि इस कार्यक्रम के माध्यम से डूंगरपुर एवं सिरोही जिलों के विद्यालयों में बच्चों की उपस्थिति 58% से बढ़कर 66 % हो गई तथा अक्षरों की पहचान कर सकने वाले बच्चों की संख्या 6% से बढ़कर 61% हो गई।
11 स्थानीय भाषाओं की सामग्री तैयार
उन्होंने कहा, ''जो विद्यार्थी एक भी शब्द नहीं पढ़ पाते थे, उनकी संख्या 96% से घटकर 12% रह गई। जो एक भी शब्द नहीं लिख पाते थे, उनकी संख्या 97% से घटकर 17% रह गई और जो समझ-आधारित प्रश्रों के उत्तर नहीं दे पाते थे उनकी संख्या 32% से घटकर 12% रह गई।
इन परिणामों के बाद अब इन जिलों के समस्त विद्यालयों में वागड़ी और गरासिया भाषा के शब्दों को शामिल कर पढ़ाया जाएगा। इसके बाद राज्य के अन्य जिलों को वहां की स्थानीय भाषा के अनुसार इस कार्यक्रम से जोड़ा जाएगा।''
शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने बताया कि अब राज्य में बोली जाने वाली 11 स्थानीय भाषाओं की सामग्री तैयार की गई है। इनमें कार्यपुस्तिका, कहानी पुस्तकें, चित्र चार्ट, कविता पोस्टर, स्थानीय भाषा के पहेलियां, खेल और बालगीत शामिल हैं।
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