Press Trust of India | August 11, 2026 | 05:47 PM IST | 2 mins read
न्यायमूर्ति इरशाद अली ने यह आदेश विपिन मिश्रा सहित 24 याचिकाकर्ताओं की ओर से दाखिल याचिका स्वीकार करते हुए दिया।

लखनऊ: इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने विशेष जरूरत वाले बच्चों को सरकारी विद्यालयों में पढ़ाने वाले विशेष शिक्षकों और 'रिसोर्स' शिक्षकों को बड़ी राहत देते हुए राज्य सरकार को उन्हें संबंधित नियमित शिक्षकों के समान वेतनमान और अन्य परिणामी सेवा लाभ प्रदान करने का निर्देश दिया। पीठ ने आदेश के अनुपालन के लिए प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने की तारीख से 4 महीने का समय दिया।
न्यायमूर्ति इरशाद अली ने यह आदेश विपिन मिश्रा सहित 24 याचिकाकर्ताओं की ओर से दाखिल याचिका स्वीकार करते हुए दिया। याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति जिला स्तरीय चयन समितियों के माध्यम से 'इटिनरेंट टीचर' और 'रिसोर्स टीचर' के रूप में सर्व शिक्षा अभियान तथा शासनादेशों के तहत हुई।
उनकी नियुक्तियों को संविदात्मक बताते हुए शुरुआत में 6,000 रुपये प्रतिमाह मानदेय तय किया गया था हालांकि, याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे नियमित विशेष शिक्षकों के समान ही कार्य कर रहे थे।
याचिकाकर्ताओं ने विभिन्न सरकारी विद्यालयों में विशेष जरूरत वाले बच्चों को शिक्षा देने के साथ उनके आकलन, पुनर्वास, काउंसलिंग और लगातार निगरानी का कार्य किया। इन विशेष शिक्षकों के पास भारतीय पुनर्वास परिषद द्वारा निर्धारित आवश्यक योग्यताएं थीं और संविदा की अवधि लगातार बढ़ाए जाने के कारण उन्होंने कई वर्षों तक सेवा दी।
पीठ ने पाया कि विशेष शिक्षण जैसे महत्वपूर्ण कार्य करने के बावजूद याचिकाकर्ताओं को केवल निश्चित मानदेय दिया जा रहा था जबकि समान प्रकृति का कार्य करने वाले नियमित शिक्षकों को नियमित वेतनमान और अन्य सेवा लाभ मिल रहे थे।
याचिकाकर्ताओं ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन बताते हुए समान वेतन दिये जाने का अनुरोध किया था। पीठ ने 'इंटीग्रेटेड एजुकेशन फॉर डिसेबल्ड चिल्ड्रेन' (आईईडीसी) योजना की धारा 12.3 का भी उल्लेख किया।
इसमें विशेष शिक्षकों को संबंधित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में उसी श्रेणी के शिक्षकों के समान वेतनमान दिए जाने का प्रावधान है। पीठ ने कहा कि राज्य सरकार शिक्षकों की सेवा शर्तों से जुड़े प्रावधानों की अनदेखी नहीं कर सकती।
अदालत ने कहा कि केवल नियुक्ति को संविदात्मक बताए जाने के आधार पर योग्य शिक्षकों को उनके वैधानिक और संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। पीठ ने कुछ याचिकाकर्ताओं द्वारा बाद में नई नियुक्तियों को स्वीकार करने की राज्य सरकार की दलील को भी खारिज कर दिया।
पीठ ने कहा कि बाद की नियुक्ति से पूर्व की सेवा अवधि में अर्जित अधिकार समाप्त नहीं हो जाते। अदालत ने विशेष शिक्षकों को वेतनमान में समानता के साथ वार्षिक वेतनवृद्धि, अनुमन्य अवकाश, जहां लागू हो वहां मातृत्व लाभ और सेवा की निरंतरता समेत सभी परिणामी सेवा लाभ देने का निर्देश दिया।