Press Trust of India | April 7, 2026 | 10:41 PM IST | 2 mins read
पीठ ने कहा, ओबीसी, एससी या एसटी जैसी आरक्षित श्रेणी से संबंधित, अधिक योग्य पीडब्ल्यूडी उम्मीदवार को किसी अनारक्षित पीडब्ल्यूडी पद से केवल इसलिए वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि “'सामान्य” श्रेणी का कोई अभ्यर्थी भी उपलब्ध है।

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय (SC) ने 7 अप्रैल को कहा कि दिव्यांग व्यक्तियों (PWD) के लिए “अनारक्षित” रिक्तियां एक खुला पूल हैं, जहां योग्यता ही निर्णायक कारक होती है और किसी भी सामाजिक या विशेष श्रेणी के पात्र उम्मीदवारों को नियुक्त किया जा सकता है।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के एक फैसले को रद्द करते हुए कहा कि अनारक्षित श्रेणी कोई अलग “सामाजिक श्रेणी” नहीं है, बल्कि यह सभी के लिए एक खुला क्षेत्र है।
पीठ ने आगे कहा, ओबीसी, एससी या एसटी जैसी आरक्षित श्रेणी से संबंधित, अधिक योग्य पीडब्ल्यूडी उम्मीदवार को किसी अनारक्षित पीडब्ल्यूडी पद से केवल इसलिए वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि “'सामान्य” श्रेणी का कोई अभ्यर्थी भी उपलब्ध है।
फैसला लिखने वाले न्यायमूर्ति सिंह ने कहा, “आरक्षण कानून में यह बात पूरी तरह से तय है कि 'अनारक्षित/खुली' श्रेणी का मतलब एससी, एसटी या ओबीसी जैसी किसी सामाजिक/सामुदायिक श्रेणी से नहीं है। दूसरे शब्दों में, अनारक्षित या खुली श्रेणी के तहत आने वाला कोई भी पद किसी खास सामाजिक श्रेणी से संबंधित नहीं होता; यह सभी के लिए एक खुला क्षेत्र या पूल होता है - इस अर्थ में कि यह सभी अभ्यर्थियों के लिए खुला है, चाहे वे किसी सामाजिक या विशेष श्रेणी से संबंधित हों या न हों।”
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यह मामला पश्चिम बंगाल राज्य विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड में कनिष्ठ अभियंता (सिविल) ग्रेड-2 के पद से संबंधित एक भर्ती अभियान से जुड़ा है। अधिसूचना में एक पद विशेष रूप से अनारक्षित (दिव्यांग व्यक्ति-कमजोर दृष्टि) के लिए आरक्षित था।
इस विवाद में दो अभ्यर्थी शामिल थे-एक अनारक्षित श्रेणी का जिसकी दृष्टि कमजोर थी और जिसने 55.667 अंक प्राप्त किए, तथा एक ओबीसी अभ्यर्थी, जिसकी दृष्टि भी कमज़ोर थी और जिसने 66.667 अंक प्राप्त किए।
कंपनी ने ओबीसी अभ्यर्थी को उसकी उच्च योग्यता के आधार पर संबंधित पद पर नियुक्त किया। सामान्य श्रेणी के अभ्यर्थी ने इसे चुनौती देते हुए कहा कि चूंकि वह एक “योग्य अनारक्षित अभ्यर्थी” है, इसलिए यह रिक्ति उसे ही मिलनी चाहिए थी; और आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थी के नाम पर विचार केवल तभी किया जाना चाहिए, जब अनारक्षित श्रेणी का कोई दिव्यांग अभ्यर्थी उपलब्ध न हो।
उच्च न्यायालय की एकल-न्यायाधीश पीठ ने याचिका खारिज कर दी थी। वहीं, खंडपीठ ने इस फैसले को पलटते हुए नियोक्ता को कम योग्यता वाले अनारक्षित अभ्यर्थी को नियुक्त करने का निर्देश दिया। इसके बाद कंपनी ने शीर्ष अदालत का रुख किया।